भारतीय ज्योतिषीय गणना के अनुसार वर्त्तमान यानि श्रीसंवत 2072 में पवित्र आश्विन मास का प्रारम्भ दिनांक 29-09-2015 से हो रहा है तथा इस मास का अंत दिनांक 27-10-2015 को हो रहा है। इस मास में पाँच मंगलवार का होना अशुभ का संकेत है, साथ हीं इस मास का प्रारम्भ मंगलवार से हो रहा है यानि आश्विन मास का पहला सूर्योदय मंगलवार को हो रहा है और इस मास का अंत भी मंगलवार को हीं हो रहा है यानि इस मास का अंतिम सूर्यास्त भी मंगलवार को हीं हो रहा है।
भारतीय ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार मंगल एक क्रूर पापग्रह है जो युद्ध, झगड़ा- झंझट, मारपीट, विद्रोह, विस्फोट ,अशांति, उग्रता, शौर्य, बाहुबल,कुछ रोग, मांसपेशियों,साहस, जीवठ आदि का कारक होता है,इसलिये जिस मास का प्रारम्भ इस ग्रह् के दिन से हो और अंत भी इसी ग्रह के दिन से हो तथा मास में अधिकतम दिन भी इसी ग्रह का यानि पाँच मंगलवार आवे तो उस मास में युद्ध, आपसी-मतभेद,मारपीट, जगह-जगह उग्र घटनाएं, अविश्वास, आतंकी घटनाएं, नक्सली-विद्रोह,विस्फोटक-घटनाएं ,अग्निकांड,सैन्य-बल की कार्यवाही और सैन्य-बलों की क्षति भी होती है।इसके अतिरिक्त इस मास में व्यापक जान-हानि, धन-हानि,वर्ग-संघर्ष या जातीय-तनाव,प्राकृतिक-आपदा, भूकंप या कोई यान-दुर्घटना, विषैले-जीवोँ का प्रकोप, किसी जनप्रिय व्यक्ति की क्षति, स्त्रियों को कष्ट, शासक-वर्ग में द्वेषता, राज्यों में मतभेद, सीमा पर तनाव या झंझट आदि अशुभ फलों की भी संभावनाएं बनती हैं। ऐसे योग होने से देश में हड़ताल, किसी नए घोटाले का उजागर होना, सरकारी-कार्यों में बाधा आदि भी उत्पन्न हो सकता है।
चूँकि मंगल ग्रहों में सेनापति होता है,अतएव लाखों विषम परिस्थितियों के वावजूद सेना की विजय होती है यानि भारतीय सेना के द्वारा इस अवधी में कई शौर्य-कार्यों का मिसाल भी सामने आ सकता है। मंगल का रंग लाल होता है अतएव लाल पदार्थों की कीमतों में वृद्धि भी हो सकती है। चूँकि सेनापति का शासकीय कार्यो के निष्पादन के साथ-साथ मनोरंजन की ओर भी झुकाव होता है इसलिए इस अवधी में किसी नवीन मनोरंजन के साधनों का विकास, नई संचार व्यवस्था और यातायात के संसाधनों में वृद्धि होने की भी संभावनाएं बनती हैं।
इस महीने की 29 तारीख के साथ-साथ अक्टूबर महीने में दिनांक 3, 4, 6, 10, 11, 13, 17, 20, 23, 24 और 27 कुछ अनिष्टकारी प्रभाव दे सकता है।। इति-शुभम् ।।
पंडित मनोज मणि तिवारी,बेतिया(बिहार)
Monday, September 28, 2015
ज्योतिषीय दृष्टि में वर्त्तमान आश्विन मास का प्रभाव
Saturday, May 30, 2015
ज्योतिषीय दृष्टि में 30 मई से 16 जून 2015 तक का प्रभाव
कई हिन्दू पंचांगों के अनुसार तथा इस वर्ष में कई ग्रहों की स्थिति एवम् उनकी दृष्टि योग के कारण इस अवधि में कुछ विशेष फल मिलने की संभावनाएं बनती हैं। इस अवधि में पूर्वी-प्रान्तों में कुछ जातीय उपद्रव या अशांति हो सकती है। किसी अंतर्राष्ट्रीय महत्व के विषय पर किसी गुप्त समझौते के कारण विपक्षियों के द्वारा कोई आंदोलन की संभावना भी बन सकती है। पश्चिमी प्रांतों या पश्चिमी देशों में कोई आतंकी घटनाएं भी हो सकती है क्योंकि इस वर्ष का राजा स्वम् शनि हैं जो कि पश्चिम दिशा के स्वामी है तथा मंगल मंत्री भी हैं। सीमा पर तनाव बढ़ सकता है। यूरोप के कई देशों में जनाक्रोश या राजनैतिक संघर्ष भी होने की संभावना बन सकती है। तेज आंधी-तूफान या किसी अन्य प्राकृतिक प्रकोप से कई स्थानों से लोग पलायन करने पर विवश हो सकते हैं। दक्षिणी भाग या उत्तरी भागों में वर्षा के कारण जन-जीवन विशेष प्रभावित होने की भी संभावनाएं बन सकती है।31मई , 2, 6, 9, 13 और 16 जून अनिष्टकारी प्रभाव दे सकते हैं।
।। इति- शुभम ।।
।। पंडित मनोज मणि तिवारी, बेतिया (बिहार)
।। इति- शुभम ।।
।। पंडित मनोज मणि तिवारी, बेतिया (बिहार)
Thursday, January 29, 2015
कुण्डली में ग्रहों की दृष्टि एवं उच्च राशि में ग्रह-फल
भारतीय ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार किसी भी व्यक्ति की कुण्डली का फलादेश का विचार करने के लिए उस कुंडली में अवस्थित ग्रहों की दृष्टि किस-किस भाव पर पड़ रही है, इसकी जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है। साथ हीं यह भी देखना चाहिए कि उस कुंडली में कितने ग्रह अपनी उच्च राशि में हैं और कितने ग्रह अपनी नीच राशि में अवस्थित हैं।कौन ग्रह किस राशि में उच्च होता है तथा किस राशि में नीच होता है तथा उसका फल क्या होता है, इसकी विस्तृत जानकारी नीचे अंकित की जा रही है:- सूर्य जिस भाव में बैठा होता है वहाँ से शिर्फ़ सातवें भाव को देखता है। सूर्य मेष राशि में उच्च कहलाता है तथा तुला राशि में नीच होता है। किसी के जन्म-कुंडली में यदि सूर्य उच्च का होता है यानि मेष राशि में होता है तो वह व्यक्ति भाग्यवान, धनी, नेतृत्व शक्ति संपन्न, विद्वान, सरकार में या समाज में उच्च पद प्राप्त करनेवाला, प्रसिद्ध, उन्नति करने वाला, प्रतिष्ठित, यशस्वी और सुखी होता है। ऐसे व्यक्ति को अन्याय, अधर्म, दुराचार, हत्या, व्यभिचार नहीं करना चाहिए नहीं तो उसके उच्च ग्रह अपना शुभ प्रभाव देना छोड़ देते हैं। यदि सूर्य अपनी नीच राशि यानि तुला राशि में होता है तो इसके विपरीत फल प्राप्त होते हैं।
चन्द्रमा जिस भाव में बैठा होता है वहाँ से शिर्फ़ सातवें भाव को देखता है। चन्द्रमा वृष राशि में उच्च होता है तथा वृश्चिक राशि में नीच होता है। किसी के जन्म-कुंडली में यदि चन्द्रमा उच्च का होता है यानि वृष राशि में होता है तो वह व्यक्ति अलंकार-प्रिय, मिष्ठान भोजी, विलासी, माननीय, कोमल ह्रदय वाला, विदेश-यात्रा करनेवाला, यात्रा-प्रिय, सुखी और चपल होता है। ऐसे व्यक्ति को माता, सास, दादी या किसी औरत के साथ अन्याय या अपमान नहीं करना चाहिये नहीं तो उसके उच्च ग्रह अपना शुभ प्रभाव देना छोड़ देते हैं। यदि चन्द्रमा अपनी नीच राशि अर्थात वृश्चिक राशि में होता है तो इसके विपरीत फल प्राप्त होते है।
मंगल जिस भाव में बैठा होता है वहाँ से सातवें, चौथे और आठवें भाव को देखता है।मंगल मकर राशि में उच्च होता है तथा कर्क राशि में नीच होता है। किसी के जन्म-कुंडली में यदि मंगल उच्च का होता है यानि मकर राशि में होता है तो वह व्यक्ति शक्तिमान, परिश्रमी, धैर्यवान, सरकार द्वारा सम्मान प्राप्त करने वाला, पुलिस या सेना में कार्य करने वाला, विजेता, लड़ाई में विजय पाने वाला, साहसी और क्रोधी होता है। ऐसे व्यक्ति को अपने सगे भाई, मित्र, साला, बहनोई, रिश्तेदार और गुरु के साथ विश्वासघात या अपमान नहीं करना चाहिए, नहीं तो उसके उच्च ग्रह अपना शुभ प्रभाव देना छोड़ देते हैं। यदि मंगल अपनी नीच राशि यानि कर्क राशि में होता है तो इसके विपरीत फल प्राप्त होते है।
बुध जिस भाव में बैठा होता है वहाँ से शिर्फ़ सातवें भाव को देखता है। बुध कन्या राशि में उच्च होता है तथा मीन राशि में नीच होता है। किसी के जन्म कुंडली में यदि बुध उच्च का होता है यानि कन्या राशि में होता है तो वह बुद्धिमान, लेखक, प्रकाशन संबंधी कार्य करने वाला, राजा तुल्य सुख भोगने वाला, वंश वृद्धि करने वाला, प्रसन्न रहने वाला, गणित संबंधी कार्य करनेवाला, व्यापार करनेवाला, धन एवं जमीन बढ़ाने वाला, शत्रुनाशक और भौतिक सुख भोगनेवाला होता है। ऐसे व्यक्ति को अपनी पुत्री, बहन, साली, बुआ या किसी भी कन्या को कष्ट नहीं देना चाहिये, नहीं तो उसके उच्च ग्रह अपना शुभ फल देना छोड़ देते हैं। यदि बुध अपनी नीच राशि यानि मीन राशि में होता है तो इसके विपरीत फल प्राप्त होते हैं।
गुरु जिस भाव में बैठा होता है वहाँ से सातवें, पाँचवें और नौवें भाव को देखता है। गुरु यानि बृहस्पति कर्क राशि में उच्च होता है तथा मकर राशि में नीच होता है। किसी के जन्म-कुंडली में यदि गुरु उच्च का होता है यानि कर्क राशि में होता है तो वह विद्वान, शासक, मंत्री, शासनप्रिय, सुशील, उदार, सुखी, ऐश्वर्यशाली, स्वभाव से अधिकारप्रिय, नेतृत्व करनेवाले, संचालनकर्ता, न्याय प्रिय, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायाधीश या वकील आदि होता है। ऐसे व्यक्ति को धर्म, देवी-देवता, ब्राह्मण, गुरु, साधु-सन्यासी, पिता, चाचा, दादा और श्रेठ जनों को कष्ट या अपमान नहीं करना चाहिये, नहीं तो उसके उच्च ग्रह अपना शुभ फल देना छोड़ देते हैं। यदि गुरु अपनी नीच राशि यानि मकर राशि में होता है तो इसके विपरीत फल प्राप्त होते हैं।
शुक्र जिस भाव में बैठा होता है वहाँ से शिर्फ़ सातवें भाव को देखता है। शुक्र मीन राशि में उच्च होता है तथा कन्या राशि में नीच होता है। किसी के जन्म-कुंडली में यदि शुक्र उच्च का होता है यानि मीन राशि में होता है तो वह सुन्दर, प्रेमी, कामी, विलासी, भाग्यवान, संगीतप्रिय, शान-शौकतवाला, खुशबू का प्रेमी, सैर करनेवाला, ऐश्वर्यशाली, भूमि-भवन से युक्त, कई वाहनों का स्वामी, सुखी और धनी होता है। ऐसे व्यक्ति को अपनी स्त्री या किसी भी स्त्री को कष्ट पीड़ा नहीं देनी चाहिये। स्त्री-समाज को अपमानित नहीं करना चाहिये, नहीं तो उसके उच्च ग्रह अपना शुभ फल देना छोड़ देते हैं। यदि शुक्र अपनी नीच राशि यानि कन्या राशि में होता है तो इसके विपरीत फल प्राप्त होते हैं।
शनि जिस भाव में बैठा होता है वहाँ से सातवें, तीसरे और दशवें भाव को देखता है। शनि तुला राशि में उच्च होता है तथा मेष राशि में नीच होता है। किसी के जन्म-कुंडली में यदि शनि उच्च का होता है यानि तुला राशि में होता है तो वह अधिपति, जमींदार, राजा तुल्य शक्तिमान, यशस्वी, परम-शक्तिशाली, भाग्यशाली, चिंतन करनेवाला, पुर्ण प्रगति करनेवाला, जादूगर, इंजिनियर, रसायन-शास्त्री, साहित्यकार, वैज्ञानिक, पूर्ण रहस्यवादी आदि होता है। ऐसे व्यक्ति को चाचा और निम्न वर्ग के लोगों को किसी प्रकार का कष्ट नहीं देना चाहिये साथ हीं उसे मांस-मदिरा तथा पर-स्त्री गमन से बचना चाहिए, नहीं तो उसका शनि अपना शुभ फल देना छोड़ देता है। यदि शनि अपनी नीच राशि यानि मेष राशि में होता है तो इसके विपरीत फल प्राप्त होते हैं।
राहु एक छाया ग्रह है। राहु मिथुन राशि में उच्च होता है तथा धनु राशि में नीच होता है। किसी के जन्म-कुंडली में यदि राहु उच्च का होता है यानि मिथुन राशि में होता है तो वह शूरवीर, पराक्रमी, कठोर एवं उद्दत स्वभाव वाला, साहसी, ताकतवर, मानी-अभिमानी, कीर्ति स्थापित करनेवाला, संशयी, तीव्र निर्णय लेनेवाला, धन बढ़ाने वाला परंतु किसी का परवाह नहीं करनेवाला होता है। ऐसे व्यक्ति को अपनी ताकत के बल पर किसी को सताना नहीं चाहिए तथा अवैध सम्बन्ध से बचना चाहिये, नहीं तो उच्च राहु का शुभ फल शीघ्र हीं समाप्त हो जाता है।
केतु भी एक छाया ग्रह है। केतु धनु राशि में उच्च होता है तथा मिथुन राशि में नीच होता है। किसी के जन्म-कुंडली में यदि केतु उच्च का होता है यानि धनु राशि में होता है तो वह धनी, धन-संग्रह करनेवाला, भौतिक उन्नति करनेवाला, भ्रमणशील परंतु नीच स्वभाव का होता है। ऐसे व्यक्ति को नीच कर्म से बचना चाहिये नहीं तो उसके द्वारा संग्रहित दौलत शीघ्र हीं नष्ट हो जाता है।
इसप्रकार इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखकर ही किसी भी व्यक्ति की कुंडली के सन्दर्भ में फलादेश किया जाता है।इसके बाद के लेख में सभी ग्रहों का पुर्ण परिचय और उसका मानव-जीवन पर प्रभाव के बारे में लिखने का प्रयत्न करूँगा। आप सबों से इस कार्य में सुझाव सादर आमंत्रित है ताकि बेहतर लेख दे सकूँ। धन्यवाद...
।। इति-शुभम् ।।
पंडित मनोज मणि तिवारी, बेतिया (बिहार)
Tuesday, January 27, 2015
कर्म और ज्योतिष-शास्त्र
विभिन्न हिन्दू-धर्मशास्त्रों के अनुसार "कर्म"के तीन प्रकार बताये गए हैं:--(1) संचित कर्म:- अनेक जन्मों के पाप-पुण्यों द्वारा अर्जित कर्म " संचित-कर्म" कहलाते हैं। (2) प्रारब्ध :- अपने संचित कर्मो में से जितने कर्मो का फल वर्त्तमान शरीर, जो भोगना आरम्भ कर देता है उसे "प्रारब्ध" अथवा "भाग्य" कहा जाता है। (3) वर्त्तमान शरीर द्वारा होने वाले प्रत्येक पाप और पुण्यात्मक कर्मो को "क्रियमाण-कर्म" कहते हैं।
भरतीय-दर्शन के अनुसार "आत्मा" अमर है। इसका कभी भी नाश नहीं होता। कर्मों के अनादि-प्रवाह के कारण आत्मा विभिन्न योनियों को धारण करता रहता है। अनेक जन्मों के संचित कर्म-फलों को एक साथ किसी एक योनि में भोगना संभव नहीं होता, इसलिए उसे बार-बार विभिन्न योनियों को धारण करना पड़ता है। अतः उसे एक-एक करके भोगना पड़ता है। इसी कारण जीव को बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र में भ्रमण करते हुए विभिन्न योनियों को धारण करना पड़ता है। जिस दिन संचित कर्मों का भोग समाप्त हो जाता है तथा क्रियमाण-कर्म शुभ होता है, उसी समय आत्मा बार-बार के आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाती है। "श्रीमद्भगवतगीता" के अनुसार ज्ञान रूपी अग्नि संचित-कर्मों को नष्ट कर देती है। इस ज्ञानाग्नि को प्रज्ज्वलित करने के लिए अनेक उपाय बताये गये हैं। उन्हीं उपायों में एक प्रमुख है "ज्योतिषशास्त्र" ।
संचित-कर्मों में से जितने कर्मो का फल वर्त्तमान शरीर, जो भोगना आरम्भ कर देता है उसे "प्रारब्ध" अथवा "भाग्य" कहते हैं। प्रारब्ध-कर्म अर्थात भाग्य द्वारा प्राप्त सुख-दुःख प्रत्येक प्राणी को भोगने पड़ते हैं, परंतु जिस प्रकार किसी "औषधि-प्रयोग" द्वारा किसी रोग से शीघ्र छुटकारा पा लिया जाता है, उसी प्रकार "ज्योतिष-विद्या" के आधार पर प्रारब्ध यानि भाग्य के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करके तप, दान-पुण्य, शुभ-कर्म आदि क्रियमाण-कर्मों के औषधि रूपी उपायों के द्वारा उसके दुष्प्रभाव से शीघ्र मुक्ति पायी जा सकती है। क्रियमाण-कर्म पूर्णतः परिवर्तनशील होते हैं।अपनी ज्ञान और पुरुषार्थ के बल पर उनमें व्यापक परिवर्तन किया जा सकता है। इस प्रकार "प्रारब्ध" को अपने क्रियमाण शुभ-कर्मों द्वारा बदला जा सकता है। इसके अतिरिक्त अपने वर्त्तमान जन्म के शुभ-कर्म रूपी पुरुषार्थ द्वारा अपने अगले जन्म के लिए श्रेष्ठ प्रारब्ध का निर्माण भी किया जा सकता है।
"ज्योतिष-शास्त्र" के उपयोग का सबसे बड़ा लाभ "प्रारब्ध" अर्थात संचित कर्मो का ज्ञान प्राप्त होना है। उसे जानकर "पुरुषार्थ" द्वारा उसमे अनुकूल परिवर्तन लाने के लिए अनेक शुभ कर्म किये जा सकते हैं। जैसे:- किसी शुभ-ग्रह की दशा, शुभ-मुहूर्त अथवा शुभ-योग में आरम्भ किये गए किसी कार्य अथवा यात्रा में शुभ फल प्राप्त होने की प्रबल संभावना रहती है और इसके विपरीत कार्य करने से विपरीत फलों की संभावना बनती है। अतः ज्योतिष-शास्त्र की उपयोगिता जानकर मनुष्य को इससे अधिक से अधिक लाभान्वित होने की कोशिश करनी चाहिए। इस शास्त्र के आधार पर बुद्धिमान व्यक्ति अपने पुरुषार्थ द्वारा अपने प्रारब्ध को बदलने में सक्षम हो सकता है। यहीं इस शास्त्र का सबसे बड़ा लाभ है।
।। इति-शुभम् ।।
पंडित मनोज मणि तिवारी, बेतिया (बिहार)
भरतीय-दर्शन के अनुसार "आत्मा" अमर है। इसका कभी भी नाश नहीं होता। कर्मों के अनादि-प्रवाह के कारण आत्मा विभिन्न योनियों को धारण करता रहता है। अनेक जन्मों के संचित कर्म-फलों को एक साथ किसी एक योनि में भोगना संभव नहीं होता, इसलिए उसे बार-बार विभिन्न योनियों को धारण करना पड़ता है। अतः उसे एक-एक करके भोगना पड़ता है। इसी कारण जीव को बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र में भ्रमण करते हुए विभिन्न योनियों को धारण करना पड़ता है। जिस दिन संचित कर्मों का भोग समाप्त हो जाता है तथा क्रियमाण-कर्म शुभ होता है, उसी समय आत्मा बार-बार के आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाती है। "श्रीमद्भगवतगीता" के अनुसार ज्ञान रूपी अग्नि संचित-कर्मों को नष्ट कर देती है। इस ज्ञानाग्नि को प्रज्ज्वलित करने के लिए अनेक उपाय बताये गये हैं। उन्हीं उपायों में एक प्रमुख है "ज्योतिषशास्त्र" ।
संचित-कर्मों में से जितने कर्मो का फल वर्त्तमान शरीर, जो भोगना आरम्भ कर देता है उसे "प्रारब्ध" अथवा "भाग्य" कहते हैं। प्रारब्ध-कर्म अर्थात भाग्य द्वारा प्राप्त सुख-दुःख प्रत्येक प्राणी को भोगने पड़ते हैं, परंतु जिस प्रकार किसी "औषधि-प्रयोग" द्वारा किसी रोग से शीघ्र छुटकारा पा लिया जाता है, उसी प्रकार "ज्योतिष-विद्या" के आधार पर प्रारब्ध यानि भाग्य के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करके तप, दान-पुण्य, शुभ-कर्म आदि क्रियमाण-कर्मों के औषधि रूपी उपायों के द्वारा उसके दुष्प्रभाव से शीघ्र मुक्ति पायी जा सकती है। क्रियमाण-कर्म पूर्णतः परिवर्तनशील होते हैं।अपनी ज्ञान और पुरुषार्थ के बल पर उनमें व्यापक परिवर्तन किया जा सकता है। इस प्रकार "प्रारब्ध" को अपने क्रियमाण शुभ-कर्मों द्वारा बदला जा सकता है। इसके अतिरिक्त अपने वर्त्तमान जन्म के शुभ-कर्म रूपी पुरुषार्थ द्वारा अपने अगले जन्म के लिए श्रेष्ठ प्रारब्ध का निर्माण भी किया जा सकता है।
"ज्योतिष-शास्त्र" के उपयोग का सबसे बड़ा लाभ "प्रारब्ध" अर्थात संचित कर्मो का ज्ञान प्राप्त होना है। उसे जानकर "पुरुषार्थ" द्वारा उसमे अनुकूल परिवर्तन लाने के लिए अनेक शुभ कर्म किये जा सकते हैं। जैसे:- किसी शुभ-ग्रह की दशा, शुभ-मुहूर्त अथवा शुभ-योग में आरम्भ किये गए किसी कार्य अथवा यात्रा में शुभ फल प्राप्त होने की प्रबल संभावना रहती है और इसके विपरीत कार्य करने से विपरीत फलों की संभावना बनती है। अतः ज्योतिष-शास्त्र की उपयोगिता जानकर मनुष्य को इससे अधिक से अधिक लाभान्वित होने की कोशिश करनी चाहिए। इस शास्त्र के आधार पर बुद्धिमान व्यक्ति अपने पुरुषार्थ द्वारा अपने प्रारब्ध को बदलने में सक्षम हो सकता है। यहीं इस शास्त्र का सबसे बड़ा लाभ है।
।। इति-शुभम् ।।
पंडित मनोज मणि तिवारी, बेतिया (बिहार)
Monday, January 26, 2015
कुण्डली में किस भाव से क्या विचार करें...
प्रथम भाव यानि लग्न से शरीर, रूप, वर्ण, चेहरा, स्वास्थ,आयु का प्रमाण, शरीर की दुर्बलता एवं पुष्टता, आकृति, चिन्ह, आरोग्यता, शरीर-लक्षण, अवस्था-गुण, विवेकशीलता, स्वभाव, मस्तिष्क,स्मरण-शक्ति, योग्यता, मान-सम्मान, प्रसिद्धि, क्लेश आदि का विचार किया जाता है।
द्वितीय भाव यानि धन भाव से धन-दौलत, पारिवारिक सम्बन्ध, कुटुम्ब-सुख, आर्थिक-दशा, द्रव्य, सोना-चाँदी, रत्नादि का क्रय-विक्रय, कुल, मित्र, आँख, कान, नाक, मुख, स्वर, सौंदर्य, संगीत-प्रेम, सुखोपभोग, वाकशक्ति, स्वतंत्रता, सच्चाई आदि का विचार किया जाता है।
तृतीय भाव यानि सहज-पराक्रम भाव से सहोदर भाई-बहन, पराक्रम, दास-कर्म, साला, बहनोई, साहस, शौर्य, धैर्य, योगाभ्यास, गला-कन्धा, बाँह, कंठ,पत्र-व्यवहार आदि का विचार किया जाता है।
चतुर्थ भाव यानि माता-सुख भाव से माता, जमीन, मकान, सम्पति, बाग-बगीचा, दया, उदारता, सास, सुख के साधन, सवारी-सुख, उद्यम, खेती, धन,छाती, दमा-खाँसी, श्वसन-रोग, फेंफड़ा आदि का विचार किया जाता है।
पंचम भाव यानि विद्या-संतान भाव से बुद्धि, विद्या, पढ़ाई, काव्य, कला, मन्त्र-यंत्र, नीति-न्याय, विनय, व्यवस्था, देव-भक्ति, नम्रता, शिष्टाचार, गुरु-शिष्य का सम्बन्ध, पुत्र, पुत्री, गर्भ-स्थिति, संतान, पीठ, मेरुदंड, हृदय, आदि का विचार किया जाता है।
षष्टम भाव यानि शत्रु भाव से रोग, चिंता, पीड़ा, शत्रु, व्रण, शंका, चोर-भय, क्रूर-कर्म, बंधन-भय, पाप, अन्याय, लड़ाई-झगड़ा, दुःख, जहरीले एवं हिंसक जानवर से खतरा, अग्नि-भय, नुकसान, दुश्मनी, आँत, नाभि, पाचन-क्रिया, यकृत-रोग, मामा-मामी, मौसी आदि का विचार किया जाता है।
सप्तम भाव यानि पत्नी भाव से विवाह, पति-पत्नी का सम्बन्ध, काम-चिंता, मैथुन, प्रेमिका, तलाक, दाम्पत्य-जीवन, झगड़ा, प्रेम, रोजगार, व्यापार,अहंकार, कमर, गर्भाशय, किडनी-रोग, आपरेशन, पेशाब-रोग, पित्ताशय आदि का विचार किया जाता है।
अष्टम भाव यानि मृत्यु भाव से आयु, मृत्यु, जीवन, मृत्यु के कारण, व्याधि, मानसिक-चिंता, मन की व्यथा, पुरातत्व, दुर्घटना, लंबी-बीमारी, निराशा, अपमान, विषम-मार्ग, गुप्त-धन, बाधा-कष्ट, लिंग-योनि या अंडकोष संबंधी रोग, गुप्तांग-रोग, मल-मूत्र संबंधी परेशानी आदि का विचार किया जाता है।
नवम भाव यानि भाग्य भाव से धर्म, भाग्य, उन्नति, मानसिक-वृति, तीर्थ-यात्रा, दान-पुण्य, तप, धार्मिक-विचार, आध्यात्मिक-शक्ति, भविष्य-वाणी, ईश्वरीय-सहायता, कूल्हा-जाँघ आदि का विचार किया जाता है।
दशम भाव यानि कर्म भाव से राज्य, मान, प्रतिष्ठा, प्रभुता, व्यापार, अधिकार,नेतृत्व, ऐश्वर्य-भोग, कीर्ति-लाभ, बड़े लोगों से मैत्री, उच्च पद की प्राप्ति, शासन संबंधी कार्य, सरकारी- कार्य, प्रसिद्धि, उपलब्धि, पिता, पिता से सम्बन्ध, पैतृक-सम्पति,ससुर, घुटना, घुटना के इर्द-गिर्द का अंग आदि का विचार किया जाता है।
एकादश भाव यानि आय भाव से समस्त लाभ, लाभ के उपाय, आमदनी में परेशानी, सम्पति प्राप्ति या नष्ट होना, पुरस्कार मिलना, अपयश होना, घुटने के नीचे की हड्डी और मांस सम्बंधित अंग जैसे छावा-पिंडली आदि का विचार किया जाता है।
द्वादश भाव यानि व्यय भाव से हानि, दंड, व्यय, व्यसन, सरकारी जुर्माना, मुक़दमा, सजा, जेल, बदनामी, शत्रुता, विदेश-यात्रा, चोर-भय, लांछन, नेत्र, पैर की फिल्ली की जोड़ से पैर की उंगलियों तक का भाग, पैर का तलवा आदि का विचार किया जाता है।
इन बारहों भावों का फल जानने के बाद कुंडली देखकर फल बताना आसान हो जाता है। इसके बाद के लेख में विभिन्न ग्रहों की दृष्टियों का स्थान एवं उसका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में जन्म होने का प्रभाव और विभिन्न राशियों में जन्म होने के फल के बारे में लिखने की कोशिश करेंगे। आप सभी पाठकों का सहयोग अपेक्षित है।
।। इति शुभम् ।।
पंडित मनोज मणि तिवारी, बेतिया(बिहार)
Sunday, January 25, 2015
भवन सूर्यबेधी नहीं होना चाहिये...
वास्तुशास्त्र के अनुसार अपने भू-खंड पर निवास के लिए मकान-निर्माण में विशेष ध्यान देना चाहिए। वास्तु नियमो का पालन करते हुए यह भी देखना चाहिए कि मकान सूर्यवेधी न हो। जो मकान पूरब से पश्चिम की ओर लंबा होता है, उसे सूर्यवेधी मकान कहते हैं।ऐसे मकान में निवास करने वाले बीमारी, तनाव, शारीरिक परेशानी, बहुत परिश्रम से अल्पलाभ,संतान कष्ट, अशिक्षा,धन-व्यय,अशांति, कलह,द्वेषऔर सरकारी अधिकारियों के प्रकोप से परेशान हुआ करते हैं।उसके
अतः मकान उत्तर से दक्षिण की ओर लंबा होना चाहिए, ऐसे मकान को चंद्रवेधी मकान कहते हैं। ऐसे मकान में निवास करने वाले सुख,शांति,समृद्धि, सम्पन्नता, अच्छी शिक्षा,आरोग्यता, वंश-वृद्धि,धन संचय और बड़े लोगों से मैत्री करने वाले होते हैं। अगर इनके ऊपर कोई संकट भी आता है तो उसका शीघ्र हीं निवारण हो जाता है। ये अच्छी आयु का भोग भी करते हैं।
इसके अलावा मकान -निर्माण में यह भी देखना चाहिये कि मकान के किस ओर का भाग अधिक ऊँचा और किस ओर का भाग नीचा है क्योंकि मकान के भाग के ऊंचाई और नीचाई का भी उसमें रहनेवाले लोगों पर विशेष प्रभाव पड़ता है। मकान का दक्षिणी भाग सबसे ऊँचा होना चाहिए,उससे कम ऊँचा पश्चिम का भाग होना चाहिए, पश्चिम से कम ऊँचा उत्तर का भाग होना चाहिए और सबसे नीच मकान का पूर्वी भाग होना चाहिए। इसी प्रकार मकान के कोणों के ऊंचाई और नीचाई का भी विशेष ध्यान देना चाहिए। मकान का पश्चिम -दक्षिण कोण अर्थात नैऋत्य कोण का भाग सबसे अधिक ऊँचा होना चाहिए तथा पूरब -उत्तर का कोण अर्थात ईशान कोण का भाग सबसे नीचा होना चाहिए। ऐसा होने से उस मकान में रहने वाले लोगो को अच्छी उन्नति, अच्छी स्वास्थ, पूर्ण सुख, शांति, समृद्धि, ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होती है। यदि मकान -निर्माण में उसके दिशाओं के भाग की ऊंचाई और कोणों की ऊंचाई इसके विपरीत हों तो इनके विपरीत प्रभाव उस मकान में रहने वाले लोगों पर अवश्य ही पड़ता है। इसलिए मकान -निर्माण में इन विन्दुओं पर अवश्य हीं पूर्ण ध्यान देना चाहिए।
इसी प्रकार मकान में कमरों की स्थिति, पानी की बहाव यानि नाली की स्थिति,शौचालय का स्थान, रसोईघर का स्थान, पूजाघर, सिढीघर,मकान के आसपास खाली स्थान आदि पर भी ध्यान देना चाहिए। मकान -मालिक का रहने वाला कमरा सदैव पश्चिम -दक्षिण कोण यानि नैऋत्य कोण पर होना चाहिए,बच्चों का अध्ययन -कक्ष उत्तर में होना चाहिए, रसोईघर अनिवार्य -रूप से पूरब -दक्षिण कोण अर्थात अग्नि -कोण पर होना चाहिए,पूजाघर पूरब -उत्तर कोण यानि ईशान -कोण में होना चाहिए,शौचालय पश्चिम या दक्षिण दिशा में इसप्रकार बनावायें की शौच करते समय व्यक्ति का मुख उत्तर या दक्षिण दिशा की ओर रहे। मकान में पानी का बहाव दक्षिण से उत्तर की ओर या पश्चिम से पूरब की ओर होना चाहिए, नाली से जल -प्रवाह पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर नहीं होना चाहिए यानि घर से पानी का निकास पूरब, उत्तर या ईशान -कोण की ओर हीं होना चाहिए। मकान से पूरब और उत्तर खाली स्थान छोड़ना चाहिए। अगर मकान से पश्चिम और दक्षिण खाली स्थान छोड़ना अनिवार्यता हो तो पूरब और उत्तर में छोड़ी गई खाली जमीन से कम हीं छोड़ना चाहिये। ऐसा करने से मकान में रहने वाले लोगों को प्रसन्नता,ऐश्वर्य, उन्नति, सुख -शांति, वंश -वृद्धि, धन -वृद्धि और आरोग्यता आदि की प्राप्ति होती है।
इति -शुभम्
पण्डित मनोज मणि तिवारी , बेतिया ( बिहार )
Saturday, January 24, 2015
भवन-निर्माण के लिये भूमि कैसा होना चाहिये...
वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन निर्माण में भूमि चयन का बहुत महत्त्व होता है।सुविधापूर्ण वातावरण, हरियाली, समुचित सूर्य-प्रकाश तथा जल-उपलब्धि के अतिरिक्त यह भी देखना चाहिए कि वह भवन निर्माण के योग्य है या नहीं।
भोज के ग्रन्थ "युक्तिकल्पतरु" एवं "समरांगण सूत्रधार" दोनों में भूमि के चयन पर लिखा है:-
"ईशानपूर्वप्लावनो मध्य स्थान समुन्नतः ।
उत्तमः कीर्तितो देशो गृहाय च नगराय च ।। अर्थात वही भूमि गृह निर्माण के लिए उपयुक्त होगी जो मध्य भाग से उठी हो तथा पूरब-उत्तर की ओर झुकी हो।
जिस भूमि पर हरे-भरे वृक्ष हों, पानी, हरी घास एवं पत्थर भी हों और पूरब-उत्तर की ओर ढलान हो, उस भूमि पर गृह निर्माण करने से वंश-वृद्धि, धन लाभ,ऐश्वर्य तथा उत्तरोत्तर उन्नति होती है।परंतु फटी हुई भूमि मृत्युकारक, ऊसर भूमि धन नाश,शल्य युक्त भूमि सदैव दुःख, ऊँची-नीची भूमि शत्रुवृद्धि कारक होती है।
भूमि चयन में मिट्टी परीक्षण भी जरुरी है, मिट्टी ठोस होनी चाहिए। जो भूमि ठोस नहीं है,वह भवन निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है।भूमि परीक्षण में जमीन के कोणों का बहुत महत्त्व है,जो प्लाट अनेक कोणों वाले होते हैं वे शुभ नहीं होते हैं।इसीलिए आयताकार या वर्गाकार प्लाट गृह निर्माण के लिए उत्तम कहे गए हैं।
जमीन का चयन ऐसा हो कि उसपर मकान सूर्यवेधी न हो। पूरब से पश्चिम की ओर लंबा मकान सूर्यवेधी होता है, और जो मकान उत्तर से दक्षिण की ओर लंबा होता है वह चंद्रवेधि होता है। मकान चंद्रवेधी हीं शुभ होता है।चंद्रवेधी मकान में धन-जन की वृद्धि होती है। बाग-बगीचा हेतू सूर्यवेधी और चंद्रवेधी दोनों जमीन ठीक माने जाते हैं। देवालय और मंदिर के लिए सूर्यवेधी और चंद्रवेधी का विचार नहीं होता है।
इति शुभम! जय वास्तु!
पंडित मनोज मणि तिवारी, बेतिया (बिहार)
भोज के ग्रन्थ "युक्तिकल्पतरु" एवं "समरांगण सूत्रधार" दोनों में भूमि के चयन पर लिखा है:-
"ईशानपूर्वप्लावनो मध्य स्थान समुन्नतः ।
उत्तमः कीर्तितो देशो गृहाय च नगराय च ।। अर्थात वही भूमि गृह निर्माण के लिए उपयुक्त होगी जो मध्य भाग से उठी हो तथा पूरब-उत्तर की ओर झुकी हो।
जिस भूमि पर हरे-भरे वृक्ष हों, पानी, हरी घास एवं पत्थर भी हों और पूरब-उत्तर की ओर ढलान हो, उस भूमि पर गृह निर्माण करने से वंश-वृद्धि, धन लाभ,ऐश्वर्य तथा उत्तरोत्तर उन्नति होती है।परंतु फटी हुई भूमि मृत्युकारक, ऊसर भूमि धन नाश,शल्य युक्त भूमि सदैव दुःख, ऊँची-नीची भूमि शत्रुवृद्धि कारक होती है।
भूमि चयन में मिट्टी परीक्षण भी जरुरी है, मिट्टी ठोस होनी चाहिए। जो भूमि ठोस नहीं है,वह भवन निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है।भूमि परीक्षण में जमीन के कोणों का बहुत महत्त्व है,जो प्लाट अनेक कोणों वाले होते हैं वे शुभ नहीं होते हैं।इसीलिए आयताकार या वर्गाकार प्लाट गृह निर्माण के लिए उत्तम कहे गए हैं।
जमीन का चयन ऐसा हो कि उसपर मकान सूर्यवेधी न हो। पूरब से पश्चिम की ओर लंबा मकान सूर्यवेधी होता है, और जो मकान उत्तर से दक्षिण की ओर लंबा होता है वह चंद्रवेधि होता है। मकान चंद्रवेधी हीं शुभ होता है।चंद्रवेधी मकान में धन-जन की वृद्धि होती है। बाग-बगीचा हेतू सूर्यवेधी और चंद्रवेधी दोनों जमीन ठीक माने जाते हैं। देवालय और मंदिर के लिए सूर्यवेधी और चंद्रवेधी का विचार नहीं होता है।
इति शुभम! जय वास्तु!
पंडित मनोज मणि तिवारी, बेतिया (बिहार)
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